Introduction of life of maharshi Sadguru Dharamchandra dev ji Maharaj

Maharshi Sadguru Dharamchandra dev ji:-अध्यात्म-भूमि भारत मे ऋषिकुल की गौरवशाली परम्परा रही।इससे कई महान ऋषि-महर्षियों की कुल-परम्परा में ब्रह्मविद्या के आचार्य समय-समय पर होते आये हैं, जिनके त्याग और तपस्या की गाथा लोक-मानस में अभी तक रची-बसी है। । योगिकुल अत्यन्त श्रेष्ठ और दुर्लभ है। योगिकुल वह है जिसमें योगीपुरुष समय-समय से उत्पन्न होते रहते हैं। ऐसा कुल महान और सुपूज्य है। जिसके सम्बन्ध में गीता की वाणी है-

अथवा योगिनामेव कुले भवति धिमताम।
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदिदृशम।।

अर्थात योग की संतच्य प्राप्ति परमात्मा की प्राप्ति किसी कारणवश नहीं प्राप्त कर सकने योग्य व्यक्ति व्यक्ति के कुल में जन्म लेता है, जो अत्यंत अनुपस्थित है। अपने पूर्व जन्म की योग-साधना की प्राप्ति के साथ वह योगिकुल में आता है और योग-सिद्धि के लिए अपनी यात्रा आगे बढ़ाते हुए उसकी प्राप्ति करता है। इसलिए योगिकुल की अध्यात्म-क्षेत्र में अत्यंतन्त महानता सम्प्लाय गयी है।

Introduction of life of maharshi Sadguru Dharamchandra dev ji Maharaj
Introduction of life of maharshi Sadguru Dharamchandra dev ji Maharaj

इस महान गौतम गोत्रीय और सेंगर-वंशीय योगिकुल में अनन्त श्री आचार्य धर्मचन्द्रदेवजी महाराज और पूजनीया माता-पिता श्रीमती विमला देवी के यहाँ फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी, महाशिवरात्रि, वि ० सं ० १ ९ प्रकार ५ प्रकार १ ९ फरवरी १ ९९९-शुक्रवार को- दोपहर 2 बजे, उत्तर प्रदेश अरविंद अरबपति और बलराज सिंह में हुआ था। उस समय पितामह बाबा स्कम्भ मुनि और पितामही महारानी मुक्तिदेवीजी अपने पौत्ररत्न की प्राप्ति से अत्यंतन्त प्रसन्न हो उठे थे।

सभी गाँव में हर्ष का माहौल था। प्रजन और परिजन के साथ साथ सभी सम्बन्धी भी इस शुभावसर पर अपनी मंगल-कामना प्रकट करने पकड़ी ग्राम आने लगे थे। कई दिनों तक परिवार में हर्षोल्लास के साथ सोनोत्सव मनाया गया योगिकुल के इस लड़के के दिव्य मुखारविन्द पर अध्यात्म की आवाज़ और धर्म का ओज-तेज रिफम्बित था, इसलिए उनका नामकरण च धर्मचंद्रदेव-किया गया।

धर्म के प्रकाश के वे पर्याय लगते थे। जिस दिन आचार्य श्रीधर्मचंद्रदेवजी महाराज का आविर्भाव हुआ, उस दिन अध्यात्म-मार्तण्ड महर्षि सदाफलदेव जी महाराज ने अपनी डायरी में लिखा- “आज एक योगी प्रकट हुआ”।

स्वामीजी की इस उक्ति में ही प्रथगत्यजी के दिव्य योगी -गवन की एक झाँकी मिल जाती है। लौकिक अवतार में भी सूर्य का प्रकाश ही चन्द्रमा पर प्रकाशित होता है। महर्षि सदाफलदेव जी महाराज अध्यात्म-जगत के सूर्य हैं तो उसी ज्ञान का प्रकाश हेतु चन्द्रमा बनकर आचार्य धर्मचंद्रदेव जी महाराज इस धराधाम पर अवतीर्ण हुए हैं।

योगिकुल की परम्परा में योगी का प्रकट होना एक ईश्वरीय विधान के अन्तर्गत ही होता है। ईश्वर की इच्छा आपके साथ ही मूर्तिमान हो उठी। सद्गुरु आचार्य श्रीधर्मचंद्रदेवजी महाराज की जय

INTRODUCTION OF LIFE OF MAHARSHI SADGURU SADAFAL DEV JI MAHARAJ VIHANGAM YOGA

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