Vihangam yoga ek vaigyanik drishti Sadguru Sadafal dev Ji maharaj

Vihangam yoga ek vaigyanik drishti:-अनादिकाल से ही जब से मानव इस धरती पर अवतीर्ण हुआ है, उसके मन के किसी गहरे कोने से एक अज्ञात प्रश्न अनायास ही उठता रहा है- इस आश्चर्यमय जगत् का नियामक कौन है? सृष्टि का संचालन कर्ता कौन है और स्वयं वह कौन है?

मनुष्य-जगत् की अद्भुत रचना का प्रतीक मनुष्य, शारीरिक एवं बौद्धिक क्षमता से सम्पन्न मनुष्य, एक जिज्ञासा भरी दृष्टि से चिन्तन के धरातल पर खड़ा होकर जब जगत् की रहस्यमय गुत्थियों की ओर देखता है, तो निश्चय ही अपने बौनेपन पर उसे हँसी आती है।

धरती की सीमा के पार, अनन्त आकाश की असीम गहराई में क्षितिज के भाल पर झिलमिलाते असंख्य नक्षत्रों को देखकर उसे अपनी क्षुद्रता का बोध होता है।

Sadafal dev dharamchandra dev and swatantra dev ji maharaj
Sadafal dev dharamchandra dev and swatantra dev ji maharaj

धरती की गोद में निःशंक पड़ी पर्वतमालाओं की उत्तुंग शृंखलाओं से टकराता सांध्य-समीर का मौन संगीत, उफनते सागर की उनींदी उर्मियों का आलोड़न-विलोड़न एवं नील मसृण व्योम के वक्ष पर विहँसते अनन्त सितारों की दिव्य क्रीड़ा, वह एक अबोध की दृष्टि से देखता है।

वह इन रहस्यों के पार जाने के लिए आतुर हो उठता है। मगर अपनी बुद्धि की सीमा में बँधकर वह एकमात्र कौतूहल का आनन्द लेता रहता है।

जिस नियन्ता की सृष्टि इतनी रहस्यमयी है, उसी नियन्ता ने इन रहस्यों के उद्घाटन के लिए ज्ञान का वह प्रकाशपुंज भी दिया है, जिसकी दिव्य ज्योति में जगत् के मूल कारण स्वरूप उस अलौकिक सत्ता का हम साक्षात्कार कर पाते हैं। इस ज्ञान का उदय सर्वप्रथम भारत में ही हुआ है और इसीलिए यह आध्यात्मिक भूमि भी है, जिसके रजकण में ‘वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम्’ का अमर सन्देश भरा पड़ा है।

साधना की गहराई में उतर कर यहाँ के मनीषियों ने उस चिरन्तन सत्य का साक्षात्कार किया है, जिसकी अभिव्यक्ति हम सम्पूर्ण जगत् में देखते हैं। उन्होंने उस जगदाधार, जगन्नियन्ता, सर्वान्तर्यामी, परब्रह्म परमात्मा के शुद्ध चेतन स्वरूप को जाना है, जिसकी संकल्प-शक्ति से इस सृष्टि की रचना होती है। उसी नित्य अनादि परम चेतन सत्ता को हम परमेश्वर के नाम से जानते हैं।

Vihangam yoga ek vaigyanik drishti Sadguru Sadafal dev Ji maharaj
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मगर आज के इस वैज्ञानिक युग में जहाँ भौतिकवाद अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचा है, ईश्वर के अस्तित्व का प्रश्न अत्यन्त ही विचारणीय हो उठा है। क्योंकि भौतिकता की चकाचैंध ने इस पर एक प्रश्नचिह्न लगा दिया है।

चन्द्रमा के धरातल पर अपना पैर रखने वाला, मंगल-ग्रह की छाती पर अपना यान दौड़ाने वाला आज का वैज्ञानिक, बुद्धिवादी दृष्टिकोण से ईश्वर के अस्तित्व को मानने से पहले उसके स्वरूप की स्थिति जानना चाहता है, प्रायोगिक परीक्षण के द्वारा उसके अस्तित्व की परख करना चाहता है। अतएव ईश्वर के स्वरूप की व्याख्या वैज्ञानिक सन्दर्भों में आज समीचीन हो गयी है। इसके अभाव में अध्यात्म पर प्रश्नचिह्न लगा हुआ है।

आज न केवल धर्म-भूमि भारत में बल्कि पूरे विश्व में एक बार अध्यात्म की चर्चा किसी-न-किसी रूप में सुनाई पड़ रही है, जिसमें कहीं सत्य की परछाई है तो कहीं भ्रान्तियों की ऊहापोह। अध्यात्म की स्पष्ट अवधारणा के अभाव में कहीं तो यह व्यवसाय का रूप ग्रहण कर चुका है, तो कहीं इसके अर्थ का अवमूल्यन हुआ है।

कहीं यह शब्द धर्म का पर्याय बन गया है, तो कहीं सम्प्रदाय की चैखट में बन्द होकर भ्रान्ति और अशान्ति का प्रतीक बन गया है। कहीं अध्यात्म के नाम पर अनेक योग-केन्द्र अपना उद्योग चला रहे हैं, तो कहीं धर्म के ठीकेदार इस शब्द की आड़ में अपना धन्धा चला रहे हैं। ऐसी विषम परिस्थिति में अध्यात्म के वास्तविक तत्त्वज्ञान को जानना अत्यन्त आवश्यक प्रतीत होता है।

Vihangam yoga ek vaigyanik drishti Sadguru Sadafal dev Ji maharaj
Vihangam yoga ek vaigyanik drishti Sadguru Sadafal dev Ji maharaj

‘अध्यात्म’ शब्द (अधि़ आत्म) का सामान्य अर्थ है- आत्मा के ऊपर का ज्ञान यानी वह ज्ञान जो आत्मा के धरातल पर अनुभूत होता है। आत्मिक चेतना के आधार पर प्रकृति से लेकर परमात्म-तत्त्व के ज्ञान को अनुभव में उतारना ही वास्तविक अध्यात्म-बोध है। मगर आज जहाँ आत्मा और परमात्मा के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न लगा है, वहाँ वैज्ञानिक चिन्तन के इस युग में ‘अध्यात्म’ शब्द को परिभाषित करना और भी कठिन हो गया है। अतएव आवश्यकता इस बात की है कि इस शब्द के तात्त्विक अर्थ को समझने के लिए पहले आत्मा और परमात्मा की सत्ता को शास्त्रीय आधार के साथ-साथ वैज्ञानिक दृष्टि से भी समझने का प्रयास किया जाय।

जब से मानव इस धरती पर अवतीर्ण हुआ है तब से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को वह एक जिज्ञासा भरी दृष्टि से देखते आया है। अपने आपको वह रहस्यों से घिरा पाया है। जीवन की सामान्य आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ-साथ उसकी वह जिज्ञासा दार्शनिक चिन्तन में बदलती हुई दिखलाई पड़ती है।

जैसा कि हम पहले कह चुके हैं कि इस सृष्टि की रचना कैसे हुई, इस सृष्टि का विस्तार, प्रारम्भ और अंतर क्या है, जीवन की उत्पत्ति कैसे हुई, हम कौन हैं, इस जीवन से पूर्व और मृत्यु के पश्चात हमारी स्थिति क्या है, इस सृष्टि का संचालक कौन है? आदि तमाम प्रश्नों में मानव की जिज्ञासा तैरती हुई दिखलाई पड़ती हैं।

कभी वह प्रकृति की असीम शक्ति के रहस्य से अनभिज्ञ होने से उसे देवत्व या ईश्वरत्व प्रदान करता हुआ दिखलाई पड़ता है, तो कहीं ये सभी शक्तियों और खोज के सूत्रधार की खोज करने का प्रयास करता दिखता है। इन्हीं प्रयासों की परिणति प्रकृति के साथ-साथ आत्मा और परमात्मा के चिन्तन में हुई है। जिसे है दर्शन ’शब्द में समाहित किया गया है।

मगर दर्शन का एक अर्थ जहाँ सृष्टि के सम्पूर्ण प्रकाशन को स्पष्ट करने के लिए बौद्धिक विवेचन के रूप में प्रतिष्ठित हुआ है, वहीं भारतीय मनीषा में यह श् दृश्म की धातु से सत्य को देखने के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। यह केवल ही ऋषयो मन्त्रद्रष्टार: ‘के रूप में जाना गया है। यानी सत्य का प्रवर्तन साधना की गहराई में उतर कर अनुभव के धरातल पर प्रकट करना है- केवल बौद्धिक व्यायाम से जानना नहीं।

यहीं से ज्ञान के आधार-भेद में अन्तर दिखलाई पड़ता है। वस्तुतः दुखवादी अनुभूति ही भारतीय चिन्तन की आधारशिला है, जिसे हमारे ऋषियों, महर्षियों ने पल्लवित और पुष्य किया है। ज्ञान की इस पृष्ठभूमि में हम अब थोड़ा सृजन के भरोसे के सम्बन्ध में विचार करें।

विज्ञान के अनुसार इस सृष्टि की रचना नेबुला या कास्मिक एग से हुई, जो सृष्टि का प्रकाशमान आदितत्वत्व माना जाता है।] लेकिन आज से कुछ काल पूर्व तक सृष्टि में उपलब्ध तत्त्वों की वैज्ञानिक मीमांसा करते हुए यह माना जाता था कि सृष्टि में लगभग 105 मूल तत्त्व हैं और बाकी इन्हीं मूल तत्त्वों के योग-वियोग से बने हैं। विज्ञान की खोज में मूल तत्त्वों की संख्या बढ़ती जा रही है।

सम्पूर्ण सृष्टि की विविधता पर दृष्टिपात करने के साथ-साथ इन सभी पदार्थों के मूल तत्त्व को पहचानने के क्रम में विज्ञान ने अणु और फिर परमाणु की खोज की और अन्ततः इस निष्कर्ष पर विचार किया कि सभी परमाणुओं की रचना में इलेक्ट्राॅन, प्रोटान, और न्यूट्राॅन ही। हैं। इसमें तीनों के विभिन्न अनुपातों में मिलने से विभिन्न प्रकार के पदार्थों की रचना होती है।

अतः वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सर्वप्रथम नेबुला और उसके बाद धनात्मक और ऋणात्मक विद्युतमय इलेक्ट्राॅन, प्रोटान और न्यूट्राॅन के संयोग से सृष्टि के सभी पदार्थ बनते हैं- यह अब तक के परिणामों का परिणाम है। मगर वैज्ञानिक इस सृष्टि-रचना की प्रक्रिया को अपने आप होने वाला मानते हैं- इसके पीछे किसी अन्य सत्ता के अस्तित्व को नकारते हैं। साथ ही चेतन तत्त्वों की उत्पत्ति भी उसी जड़ पदार्थों के मिश्रण से मानते हैं। इस दिशा में विज्ञान की खोज अभी जारी है। हो सकता है कुछ और नए तथ्य भी प्रकाश में आयें।

इस सन्दर्भ में भारतीय चिन्तक सृष्टि के निर्माण को अपने आप घटित होने वाली प्रक्रिया न मानकर इसके पीछे किसी चेतन सत्ता का हाथ स्वीकार करते हैं और उसे ही परमात्मा या ईश्वर के नाम से अभिहित करते हैं। उनके अनुसार सृष्टि में दो प्रकार के पदार्थ परिलक्षित हो रहे हैं- एक जड़ और दूसरा चेतन। इच्छा, ज्ञान, प्रयत्ननादि के चिह्न हैं वे चेतन हैं और इनमें इनका अभाव है। लेकिन ये सम्पूर्ण जड़-चेतन सृष्टि की रचना का एक सूत्रधार है, जिसे परम-चेतन या परमात्मा कहते हैं।
सम्पूर्ण जड़-जगत् की रचना जो एक मूल तत्त्व से होती है, उसे भारतीय विचारकों ने प्रकृति मूल प्रकृति ’कहा है। इस मूल प्रकृति में तीन गुण समाहित हैं, जिन्हें सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण कहा जाता है। जब ये तीनों गुणों में साम्यावस्था रहती है, तो प्रकृति शान्त, निश्चल पड़ी रहती है।

परमात्मा की ईक्षण-शक्ति से यह साम्यावस्था भंग होती है और इसके साथ ही मूल प्रकृति आयाम हो जाती है और फिर क्रमशः सृष्टि-रचना प्रारम्भ हो जाती है। इस क्रम में आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी तत्त्व बनते हैं। जिन्हें पंच महाभूत कहते हैं। फिर ये पंच महाभूतों से जड़-जगत् की सृष्टि होती है। वैज्ञानिक भाषा में इन पंच महाभूतों में पृथ्वी को ठोस, जल को द्रव, अग्नि को ऊर्जा, वायु को गैस और आकाश को ईथर भी कह रहे हैं।

इस तरह सम्पूर्ण सृष्टि का वर्गीकरण ठोस, द्रव, गैस, ऊर्जा और मेष के नाम से किया जा सकता है। यह मूल प्रकृति शाश्वत है, लेकिन परिणामी है यानी परिवर्तनशील है। इसका अर्थ यह है कि यह प्रकृति नित्य होते हुए भी रूपान्तरित होती रहती है, लेकिन जिस प्रकार वैज्ञानिक भाषा में ऊर्जा का विनाश नहीं होता है, केवल रूपान्तर होता है- वही स्थिति प्रकृति की है।

अब इस मानव-शरीर या किसी भी चेतन प्राणी के शरीर की रचना भी उसी पंचभूतों से हुई है। इस शरीर में पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जिहना और त्वचा), पाँच कर्मेन्द्रियाँ (हाथ, पाँव, गुदा, लि ›और वाणी), पंच प्राण (प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान) के अतिरिक्त चतुष्टय अन्तःकरण ( मन, बुद्धि, चित और अहंकार) हैं।

इस तरह कुल चैबीस तत्त्वों का संयोग इस शरीर में है, लेकिन ये सभी अपने आप में जड़ हैं और इनमें जो जीवन देने वाली शक्ति है उसे ही आत्मा कहते हैं। मरने के पश्चात शरीर अपने सभी उपयोगकर्ताओं के साथ पड़ा रह गया है, लेकिन जीवनी शक्ति नहीं रहती है। उसी जीवनी शक्ति को आत्मा के नाम से माना गया है।

जिस तरह से कई विद्युत के उपकरण बिजली के प्रवाह से चलायमान हो जाते हैं, उसी तरह शरीर में स्थित कई यन्त्र इस आत्मा की चेतना के प्रवाह से क्रियाशील रहते हैं और उससे सम्बन्ध-विषण होने पर या उस यन्त्र में खंजन आ जाने से भी निष्क्रिय हो जाते हैं। हो जाते हैं।

सम्पूर्ण सृष्टि की रचनाधर्मिता के साथ इस शरीर के यन्त्रों का भी एक सूक्ष्म सम्बन्ध है। सृष्टि में उत्पन्न आकाश तत्त्व का गुण ’शब्द’ है, वायु का गुण है स्पर्श ’है, अग्नि का गुण जल रूप’ है, जल का गुण ’स्वाद’ है और पृथ्वी का गुण न् गन्ध ’है, जिसे तन्त्र कहते हैं। अब उसी पाँच गुणों को ग्रहण करने के लिए शरीरस्थ पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं, जिन्हें क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध का बोध होता है और इसी बोध को हम जीवन कहते हैं।

इस बोध की भी एक प्रक्रिया है- वह यह है कि आत्म-एकाग्रता का सम्बन्ध मन से, मन का सम्बन्धयनानेन्द्रियों से और इन सभी सत्यनानेन्द्रियों का सम्बन्ध अपने विषयों से होता है और उससे जो अर्थ अभिव्यक्ति प्रकट होता है – वही जीवन का बोध है। । इस तरह सम्पूर्ण सृष्टि में पाँच महाभूत हैं, उनके पाँच गुण विशेष हैं और इन गुणों को ग्रहण करने के लिए शरीर में पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं- यह सृष्टि के साथ व्यक्ति के सूक्ष्म सम्बन्धों को रूपायित करता है। इन ज्ञानेन्द्रियों में ग्रहणशीलता के आधार पर एक और विशेषता दिखलाई पड़ती है।

‘त्वचा’ के पास पहुँचने पर ही उसे ‘स्पर्श’ का बोध होता है। उसी तरह जिह्ना की संवेदनशीलता त्वचा से कुछ अधिक है। इसके ऊपर उठने पर नासिका की ग्रहणशीलता और बढ़ जाती है और कुछ दूरी पर के गन्ध को भी यह पकड़ लेती है। इससे अधिक ग्रहणशीलता कानों की है जो सुदूर के शब्द को भी ग्रहण कर लेते हैं।

इस तरह और ऊपर उठने पर आँखों की ग्रहणशीलता और बढ़ जाती है और बहुत दूर स्थित तारों को भी हम देख लेते हैं। यह ग्रहणशीलता का विस्तार भी हमें कुछ संकेत देता है। इस शरीर में आँखों के ऊपर भी जो स्थित है वह मन (मन) है और मन की सूक्ष्मता और बहुत अधिक है। मन एक क्षण में कहाँ-से-कहाँ चला जाता है।

इससे भी सूक्ष्म बुद्धि (Intellect) मानी गयी है, जिसके आधार पर इन ज्ञानेन्द्रियों की ग्रहणशीलता भी बढ़ जाती है। जैसे बुद्धि के द्वारा संचार या रेडियो के प्राप्तकर्ता से कान की ग्रहणशीलता, टेलीविजन या दूरबीन के द्वारा आँख की ग्रहणशीलता और अधिक बढ़ जाती है और इन ज्ञानेन्द्रियों का बोध विस्तृत हो जाता है।

इस तरह इस शरीर में बुद्धि की सूक्ष्मता को भारतीय चिन्तकों ने भी प्रतिष्ठित किया है, लेकिन बुद्धि जहाँ हाँफ कर बैठ जाती है- वहीं ज्ञान का अन्त नहीं होता है, इस सत्य को भी उन्होंने समझा है। इसलिए बुद्धि की खोज को ही परम सत्य मान कर कर बैठ जाना में ही आत्म-तोष उन्हें नहीं मिला बल्कि इसके आगे वे भी गए। बुद्धि से सूक्ष्म आत्मा और आत्मा से सूक्ष्म परमात्मा को जाना।

इसी प्रकार से साधना में भी क्रमशः उत्तरोत्तर सूक्ष्मता है। प्रारम्भिक साधना नेत्र से प्रारम्भ तक क्रमशः ऊपर उठती हुई आगे बढ़ती बढ़ती जाती है और तन्तर मन की भूमि को पारकर आत्मा की और परमात्मा की चेतन भूमि पर सद्गुरु के ज्ञान-प्रकाश में प्रतिष्ठित हो जाती है। यही आन्तरिक साधना का उत्तरवर्ती विज्ञान है।

Vihangam yoga ek vaigyanik drishti Sadguru Sadafal dev Ji maharaj
Vihangam yoga ek vaigyanik drishti Sadguru Sadafal dev Ji maharaj

असली रूप में हम देखें तो आज मनुष्य बुद्धि के सहारे सृष्टि के जानने को जानने में जितना सक्षम हुआ है, वह समुद्र के किनारे पड़ी बालुका-राशि में से एक बाल सुलभ भाव से अपनी अंजली भर बालू उठाने की क्रीड़ा-मात्र से अधिक नहीं है। । इसलिए भारतीय मनीषा ने कहा कि इस बुद्धि से भी जो सूक्ष्म है वह आत्मा है और इस आत्मा से जो सूक्ष्म है- वही परमात्मा।

बुद्धि की सूक्ष्मता तक की बात हम ऊपर कह रहे हैं। इससे अधिक सूक्ष्म ज्ञान का बोध आत्महत्या भूमि पर होता है- जिसे आत्मज्ञानी जानते हैं। इसीलिए वे अतीत की परत के साथ-साथ भविष्य के परदे को भी पढ़ लेते हैं। एक आत्मज्ञानी बैठे-बैठे अपने स्थान से ही सुदूर का दृश्य देख लेता है, और उन चित्रों को भी स्पष्टता कर देता है, जिसके लिए बुद्धि सक्षम नहीं है।

आज विज्ञान भी इसे नकारता नहीं है लेकिन उसकी शक्ति को पहचानने के प्रयास में लगा है। लेकिन ये सबसे सूक्ष्म और सबसे महान जो जो सत्ता है, वह परमात्मा है और वही सबका आधार है- सृष्टि का सूत्रधार है। इसलिए उसे यान अणोनीयंग महतो चिप्यान् ’यानी जो सूक्ष्म से भी सूक्ष्म और महान् से भी महान् सत्ता है- वही परमात्मा है।

आत्मा जहाँ कहीं विषाणु-साध्य है, वहीं परमात्मा विभु-एकाग्रता है। आत्मा एकदेशीय सत्ता है, तो परमात्मा सर्वदेशीय सत्ता है। परमात्मा अनन्त दिव्य गुण, अनन्त शक्ति, अनन्त ऐश्वर्य और अनन्त ज्ञान का स्वामी होने के साथ-साथ सर्वविप, अन्तर्यामी, सर्वप्रकाशक और साक्षी, जगत् का शासक और काल, कर्म आदि की संज्ञा है, जिसके सम्बन्ध में श्वेताश्वतरनिनिषद् का ऋषि उद्घोष करता है-

एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा। 
कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च।।
– श्वेता0 6/11

अब हम इस परमात्म-सत्ता जिसे सृष्टि का मालिक और संचालक भी कहते हैं, उसके अनन्त गुणों पर एक विहंगम दृष्टि है। बुद्धि बहुत कुछ जान सकती है- लेकिन सब कुछ नहीं। उसी तरह बुद्धि बहुत कुछ खोज कर सकती है- लेकिन सब कुछ नहीं। हम कुछ उदाहरण से इसे स्पष्ट रूप से समझ सकते हैं।

आज हमने विदुत की खोज की है और उससे कई उपकरण बनाये हैं, जिसका लाभ समाज को मिल रहा है। इसके पीछे वैज्ञानिक बुद्धि ही है- लेकिन इसे क्रियात्मक रूप देने में एक बहुत बड़ी व्यवस्था, साधन और अर्थ लगा हुआ है तब कहीं जाकर हम इसका उपभोग कर रहे हैं। मगर परम पिता परमात्मा की सृष्टि में एक सूर्य उगता है- एक चन्द्र उदित होता है और सम्पूर्ण सृष्टि प्रकाशित हो उठती है।]

इसके लिए न तो कोई संयन्त्र लगा रखा है, न कोई मानवीय व्यवस्था और साधन ही। इसी तरह हम देख लें कि हम जो जीवन की रक्षा और भोग के लिए नाना प्रकार के अच्छे-बुरे कार्य करते हैं, उसकी एक-एक शवाँस किस पर साधक है? हर सांस को जीवन देने वाला कौन है? एक डाक्टर अगर किसी मरीज को ऑक्सीजन देकर कुछ घण्टों के लिए जीवन प्रदान करता है तो उसके प्रति हम कृतज्ञता का भावपूर्ण व्यवहार कर रहे हैं,

लेकिन क्या कभी हमने सोचा है कि इस वायुमण्डल में आक्सीजन व्हेन घोल पैदा होते हैं जिससे जलचर, नभचर और पृथ्वी के सभी प्राणी जीवित हैं? इसका न तो कोई प्लांट लगा है और न ही इसके पीछे कोई मानवीय बुद्धि है। लेकिन उस परम पिता की इस असीम कृपा की ओर हमारा ध्यान नहीं जाता।

Vihangam yoga ek vaigyanik drishti Sadguru Sadafal dev Ji
Vihangam yoga ek vaigyanik drishti Sadguru Sadafal dev Ji

इतना ही नहीं ईश्वर-प्रदत्त वस्तुओं के वितरण की समानता को भी हम समझ नहीं पाते हैं- जहां कोई अंतर-अभिव्यक्ति नहीं है। उसी तरह हम दो चार उपग्रह-अन्तरिक्ष में छोड़ कर कई दिनों तक वैज्ञानिक उपलब्धियों की प्रशंसा के गीत गाते रहते हैं, लेकिन कभी यह विचार नहीं करते कि इस ब्रह्माण्ड में अरबों-खरबों तारे जो पृथ्वी से करोड़ों गुणा बड़े हैं, अपनी-अपनी कक्षा। रहे एक नियमित गति से चलने वाले हैं- कहीं कोई लक्षण नहीं।

और इसका नियन्त्रण करने वाला न तो रूस है और न अमेरिका है। इस सर्वज्ञ परमात्मा के अस्तित्व का इससे बढ़ कर और उदाहरण क्या हो सकता है? सृष्टि के इस सतत प्रवाह में कहीं भी व्यवस्थापन आने से सृष्टि क्रम में ही उलट-फेर हो जाएगा।

अनन्त सृष्टि की रचनाधर्मिता की इस प्रक्रिया में जो अनन्त सत्ता समर्थ है- वही परमात्मा है, जो विभु-चेतना है। इस प्रकार हम देखते हैं कि सृष्टि की रहस्यात्मकता में भी एक ताराम्यता है, जिसमें कर्मेन्द्रियों से सूक्ष्मज्ञानानेन्द्रियों, ज्ञानानेन्द्रियों से सूक्ष्म मन, मन से सूक्ष्म बुद्धि, बुद्धि से सूक्ष्म आत्मा और आत्मा से सूक्ष्म परमात्मा का अधिकार है। इसे श्रीमद्भगवद्गीता में इस तरह व्यक्त किया गया है-

इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः।

मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः।।

– गीता 3/42

इस आध्यात्मिक रहस्य को कठोपनिषद् में इस तरह अभिव्यक्त किया गया है-

इन्द्रियेभ्यः पराह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः।मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान् परः।।

महतः परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुषः परः।पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परागतिः।।

– कठ/अध्याय 1/वल्ली 3/10-11

यानी इन्द्रियों से अर्थ (विषय) ज्यादा बलवान् है, विषयों से मन, मन से बुद्धि और बुद्धि से आत्मा और आत्मा से भी बलवान् परमात्मा है। वही परमात्मा सबका परम आधार है और उस परम पुरुष से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है। इन तथ्यों का गहन वैज्ञानिक शब्दावली में हम ऊपर कर चुके हैं।

अब आत्मा और परमात्मा की सत्ता के सम्बन्ध में सिर्फ एक बात रह जाती है कि इसका स्वरूप का बोध कैसे हो और बिना बोध के इसके अस्तित्व को कैसे स्वीकार कर लिया जाए। यह सन्दर्भ में सीधी-सी बात है कि आत्महत्या जब जड़-संघट्टियों से संपर्कित हो जड़-जगत् के बारे में ज्ञान प्राप्त करती है तो उसी चेतना को जड़ अलंकरणों से समेट कर आत्म-भूमि पर केन्द्रित करने से आत्मज्ञान और तन्तर परमात्मा की ओर से होती है। केन्द्रित करने से परमात्मतत्त्व का बोध होता है।

उनके साधन-भेद के अलग-अलग मण्डल हैं। इस तरह जैसे इन्द्रियों की सूक्ष्मता ऊपर उठते हुए विस्तार पाती जाती है, उसी तरह साधना की भूमि क्रमशः ऊपर उठती हुई अन्तः आत्म-भूमि और परमात्म-भूमि पर प्रतिष्ठित हो जाती है।

इसी आत्महत्या के रहस्य को जानने और इसे शरीर के विभिन्न शक्ति-केन्द्रों पर केन्द्रित कर कई प्राकृतिक शक्तियों को प्रकट करने के साथ-साथ अंतत आत्म आत्म-भूमि और परमात्म-भूमि का ज्ञान समर्थ सद्गुरु के संरक्षण में साधना द्वारा प्राप्त करना वही आध्यात्मिक आत्मा का है। मूल विषय है।

sadguru sadafal dev ji maharaj
sadguru sadafal dev ji maharaj

आज साधनात्मक ज्ञान के अभाव में ही अध्यात्म आत्मांतों से युक्त हो गया है और इसके साथ-साथ नाना प्रकार की विस ›तियाँ जोड़ दी गयी हैं। वस्तुतः अध्यात्म चेतना के रहस्य को जानने का विज्ञान है, इसीलिए इसे चेतन विज्ञान चेतना भी कहता है।

आत्महत्याओं पर केन्द्रित होने पर जो तत्त्वज्ञान समाज के कल्याण के लिए, व्यक्तिगत उत्थान और मानवमात्र के विकास के लिए उतरते हैं, वे वास्तव में अध्यात्म या धर्म के शाश्वत तत्त्व हैं। इस आत्महत्या को ब्रह्मधार से जोड़ देने पर ही ब्रह्म के गुण-धर्म उस आत्मा में उतरने लगते हैं और तब वह महात्मा कहलाने का अधिकारी बन जाता है।

इसके लिए पहले इन्द्रियों को विषय से समेटना, मन को इन्द्रियों से समेटना और आत्मा में लय करना और फिर आत्महत्या को परमात्म-तत्त्व की ओर मोड़ देना यही अध्यात्म का साधनत्मक सिद्धान्त है और इसी अवस्था में प्राप्त करने पर ब्रह्मानन्द की अनुभूति और ब्रह्मविद होने वाली है। का गौरव प्राप्त होता है।

इसी अध्यात्मविद्या को ब्रह्मविद्या भी कहते हैं, जोको जानने से वि ब्रह्मविद्मावव भवति ’अर्थात ब्रह्म ब्रह्म जिसने ब्रह्म को जान लिया वह ब्रह्म बन गया है’ का सिद्धान्त चरितार्थ होता है। इस ज्ञान के प्रकाश में हमारे जितने भी सांसारिक कार्य होते हैं, वे निष्पक्षकलुष और स्वार्थरहित होते हैं। इसी अध्यात्म-रहस्य को गीता में इस तरह व्यक्त किया गया है-

युंजन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते।।
– गीता 6/28

अर्थात् सदैव आत्मा से युक्त होकर योगी कल्मशिरित हो ब्रह्मानन्द की अनुभूति प्राप्त करता है। इस तरह आत्मा और ब्रह्म केवल परिभाषित करने के विषय नहीं बल्कि अनुभव के भी विषय हैं, जिसे साधन-अभ्यास द्वारा जाना जा सकता है।

आज हम आत्मा-परमात्मा को इसलिए नहीं जानते हैं, क्योंकि वह मन और बुद्धि के मण्डल से नहीं बल्कि आत्मभूमि के द्वारा चेतन साधन से जाना जाता है।

इसी संदर्भ में जब आत्महत्या आगे बढ़ती है तब दिव्य चेतनदृष्टि मिलती है, जिससे हम आत्मा और ईश्वर के रहस्य-भेद को पाते हैं। आज मन और बुद्धि की सीमा के अंदर ही अध्यात्म को व्याख्यायित करने का प्रयास किया जा रहा है, जो साधन-शून्यता का प्रतीक है।

अतएव अध्यात्म एक चेतन विज्ञान है और इसी के प्रकाश में धर्म का शुद्ध स्वरूप प्रकट होता है अन्यथा वह संबद्धप्रदाय, मत-मतान्तर, अन्ध विश्वासों और दुराग्रहों का समुच्चय बनकर रह जाता है। धर्म इसी अध्यात्म-साधन द्वारा प्राप्त आत्मज्ञान की ध्वनि है। आज सम्पूर्ण मानवता के कल्याण के लिए इस ध्वनि को सर्वत्र मुखरित करना है।

जगत् की रचना की इस प्रक्रिया को योग की परिभाषा में आदित्य विहंगम योगी अनन्त श्री स्वामी सदाफलदेव जी महाराज ने इस प्रकार वर्णन किया है-

नित्य अनादि षट् वस्तु है, इनकर सब विस्तार।
रूप गुण अरु कर्म का, व्याख्या सकल पसार।।
– स्वर्वेद 1/1(7)

अर्थात् ब्रह्म (नि: कर्म), अक्षर, नित्य अनादि सद्गुरु, आत्मा, प्रकृति और काल- ये छह नित्य अनादि पदार्थ हैं। इसमें प्रथम चार तो चेतन हैं, प्रकृति जड़ है और काल जड़-चेतन दोनों से रहित है। निःअक्षर से अक्षर और अक्षर से प्रकृति के संयोग से क्षरात्मक जगत् की सृष्टि होती है। इस तरह जगत् का अधिपति आधार ब्रह्म ही है।

स्वामी जी के चेतन विज्ञान के आधार पर सृष्टि के मूलारम्भ में केवल एक परम पुरुष (निःअचार, सार शब्द) था और उसी के आधार पर प्रकृति के परमाणु निस्तब्ध-तटस्थकम्प बीज रूप में विद्यमान थे और अनन्त जीव (आत्मा) भी सुषुप्ति में उसी के आधार पर। पर स्थित थे और पूरे ब्रह्मांड का संचालक महाशक्ति पत्र (अक्षर ब्रह्म, हिरण्यगर्भ) भी उसी के आधार पर स्थित था।

इस प्रकार सृजन के आरम्भ में परमाक्षर के द्वारा ईक्षण करने पर जो गुप्त अक्षर ’गुप्त था, वह प्रकट हो गया और अक्षर के कम्प से प्रकृति की साम्यावस्था भंग हो गयी और सृष्टि-रचना का प्रारम्भ होने लगा। इस सृष्टि-रचना की प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए स्वामी जी लिखते हैं-

ब्रह्म जीव अरु प्रकृति से, रचना सृष्टि पसार।
कारण धारक पुरुष है, चैथा अगम अपार।।
– स्वर्वेद 2/6/43

यानी ब्रह्म, जीव और प्रकृति द्वारा समस्त सृष्टि की रचना होती है और उसका विस्तार होता है एवं चैथा अगम परम पुरुष सबको धारण करने वाला, समस्त जगत् का आधार निमित्त कारण है। इस सृष्टि-प्रक्रिया को और स्पष्ट करते हुए स्वामी जी लिखते हैं-

अक्षर चेष्टा सनिधि से, प्रकृति चाल संसार।
कारज कारण रूप में, नाश वदत व्यवहार।।
– स्वर्वेद 2/6/44

अर्थात् परमाक्षर के ईक्षण से अक्षर प्रकट होता है और अक्षर की चेष्टाओं से परमाणुओं में गति प्रकट होती है और विशाल सृष्टि का निर्माण होता है। कारण का कार्यरूप में होना ही सृष्टि का निर्माण होना है। कारण का कार्यरूप में होना ही सृष्टि है और कार्य-व्यवहार का कारण रूप में होना ही प्रलय कहा जाता है। परमाक्षर, अक्षर और प्रकृति के सम्बन्धों को रूपायित करते हुए स्वामी जी लिखते हैं-

अक्षर सत्य कुटस्थ है, माया नित परिणाम।
सब पर उत्तम पुरुष है, परमाक्षर सत्य नाम।।
– स्वर्वेद 2/6/2

अर्थात अक्षर नित्य कूटस्थ है और माया (प्रकृति) परिणामी नित्य है, क्योंकि इसका ह्रास-विकास होता है और प्रकृति कार्य रूप में परिणत होकर सृष्टि (जगत्) बन जाती है। सबसे उत्तम पुरुष परम अक्षर सत्यनाम है, जो सबका आधार है।

वह सर्वव्यापी, सर्वज्ञ, सर्वतन्मात्मा, सर्वशक्तिमान्, सच्चिदानन्द स्वरूप परम पुरुष सबसे परे शब्दरूप (सार शब्द) परब्रह्म है और उससे भिन्न ब्रह्म (अक्षर) और समस्त जीव हैं। ये सबका आधार मुक्त शब्द पूर्ण पुरुष परमाक्षर, परब्रह्म ही है। इस तरह स्वामी जी ने परब्रह्म को भगवान और ब्रह्म को अक्षर या ईश्वर नाम से अभिहित किया है।

इस प्रकार ब्रह्म के सम्बन्ध में सूक्ष्म दृष्टि अन्यत्र खोजने पर भी नहीं मिलती है। सामान्य अर्थों में परब्रह्म, ब्रह्म, ईश्वर, परमेश्वर आदि शब्दों को लोग पर्यायवाची मान लेते हैं, तथापि स्वामी जी के सिद्धान्त के अनुसार इनमें जो झीना भेद है, उसे साधना के धरातल पर ही ठीक से समझा जा सकता है।

अब प्रश्न यह उठता है कि यदि ईश्वर का अस्तित्व है, तो फिर उसकी अनुभूति सम्भव है कि नहीं? वास्तव में जो वस्तु अनुभवगम्य होती है, उसे शब्दों में व्यक्त करना बड़ा कठिन हो जाता है और शब्दों में व्यक्त करने पर भी जिसने अनुभव नहीं किया है, उसके लिए यह समझना और बहुत कठिन हो जाता है।

जिस तरह से विभिन्न पदार्थों के स्वरूप की जानकारी वैज्ञानिक पद्धति से उसके रासायनिक गुणों की व्याख्या प्रयोगशाला में एक निश्चित पद्धति खोज कर बतायी जाती है, उसी तरह शरीर की प्रयोगाशाला में भी वह पद्धति खोज निकाली गई, जिसे ‘योग’ के नाम से जाना जाता है। । अतएव ईश्वर की अनुभूति-योग-साधना ’के द्वारा ही सम्भव है।

आज कई मत-मतान्तर और सम्प्रदायों की बाढ़ में सही पथ का निर्णय कठिन हो गया है। सच्ची ईश्वर-प्राप्ति का दावा ही सभी अपने संबद्धप्रदायों के आधारशिला रखते हैं। मगर हम अगर सूक्ष्म रूप से इस पर विचार करें कि कौन-सा सही रास्ता है तो यह समझने में विशेष कठिनाई नहीं होगी।

ब्रह्म या ईश्वर एक शुद्ध चेतन सत्ता है जिसे प्रकृति के माध्यम से नहीं बल्कि चेतन-तत्त्व आत्मा के माध्यम से ही जाना जा सकता है।) ईश्वर मन, वाणी और बुद्धि का विषय नहीं है। अतएव साधना में इसके पार यानी चेतन मण्डल में जाने के बाद ही उसकी अनुभूति सम्भव है।

योग-साधन-अभ्यास से स्थूल शरीर से सूक्ष्म, सूक्ष्म से कारण, कारण से महाकारण, महाकारण से कैवल्य और कैवल्य से हंस में प्रवेश करने के पश्चात् ही उस परम चेतन सत्ता की अनुभूति हो पाती है। शरीर की उपर्युक्त अवस्थाओं का अनुभव हम प्रायः जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरिया, तुरियातीत और आप्त स्थिति में करते हैं। प्रकृति मण्डल की साधना से भी कई उपलब्धियाँ सम्भव हैं, लेकिन उस परब्रहम चेतन सत्ता की अनुभूति सम्बद्ध नहीं है।

लेकिन जब तक एम्पगुरु का मार्गदर्शन नहीं मिल पाता है, यह कठिन कार्य स्वचालित सम्भव नहीं है। सद्गुरु-प्रकाश में ही इस योग-मार्ग के साधन-अनुभव में उतरने पर सफलता मिल सकती है, अन्यथा नहीं। आत्मा की गुप्त शक्ति सद्गुरु-ज्ञान-प्रकाश में ही प्रकट होती है।

अतएव योग-साधन में हमें मनवान नहीं होना है बल्कि गुरुमुखी होना है और यहाँ गुरु से अर्थ तथाकथित नामधारी गुरुओं से नहीं है, बल्कि उस तत्त्वदर्शी से जिसने योग के माध्यम से उस परम पुरुष की प्राप्ति की है।

अतएव नियमित साधन-अभ्यास से & सद्गुरु-कृपा से उस परम ब्रह्म की अनुभूति सम्भव है। आवश्यकता है दृढ़ विश्वास की, अविचल साधना की और सद्गुरु में अनन्य श्रद्धा की। क्योंकि जीव को संसार के मोह-बन्धन से मुक्त करने वाले एम्पगुरु ही हैं।

अतः ईश्वर का अस्तित्व कोरी कल्पना नहीं है बल्कि एक वास्तविकता है जो सम्पूर्ण सृष्टि का आधारभूत कारण है और उस ईश्वर के अस्तित्व को अस्तित्व योग ’के माध्यम से अनुभव भी किया जा सकता है।

उसके निदेशकों अनेक ऋषि हैं- जो न केवल पुरातन काल में यहाँ रहे हैं, बल्कि आज भी यहाँ हैं और उसी रूप में आज भी उसकी प्राप्ति की घोषणा करते हैं। ईश्वर के उसी सहज स्वरूप का वर्णन अनन्त श्री सद्गुरु सदाफलदेव जी महाराज ने इन पंक्तियों में किया है-

सुधा श्रवित शीतल रवी, उदय तत्त्व झनकार।
अरव वर्षि आभा वरे, अनुभव पुरुष हमार।।
– स्वर्वेद 1/1/58

यहाँ ‘अनुभव पुरुष हमार’ द्रष्टव्य है। इतना ही नहीं बल्कि स्वामी जी ने यह घोषणा भी की है कि जो व्यक्ति इस विहंगम योगमार्ग का विधिवत् पालन करेगा, उसे उस परमप्रभु से मिला भी दूँगा-

महाप्रभु अनन्त दयामय, उनसे तोहिं मिलाऊँगा।
कहैं ‘सदाफल’ परमानन्दा, आवागमन मिटाऊँगा।।

जिस तरह से वैज्ञानिक प्रयोगशाला में बैठकर एक विहित विधि से पदार्थों के निर्माण की प्रक्रिया को पूरा करके सिद्धान्त को मूत्र्तरूप देखने लगता है, उसी तरह योगी भी एक विहित योग-साधन से उस परम सत्ता को केवल सिद्धान्त रूप में नहीं जानता है बल्कि एक विशेष भूमि पर उसकी अनुभूति भी प्राप्त करता है। ईश्वर को जानने की यही वैज्ञानिक दृष्टि है।

सम्पादक, विहंगम योग संदेश और पूर्व महाप्रबंधक सेल, बोकारो स्टील प्लांट
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Author  -सुखनन्दन सिंह ‘सदय’

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